
मंगलवार, 16 सितंबर 2008
काले-बादल

रविवार, 14 सितंबर 2008
तन्हाई

ट्रेन छूटने तक
मंगलवार, 9 सितंबर 2008
ओलम्पिक में मिले पदक- भारत के लिए गर्व या शर्म
चीन में वर्ष २००८ के अगस्त में खेल महाकुम्भ ओलम्पिक का आयोजन किया गया । सुखद बात यह रही कि इस आयोजन में भारत को व्यक्तिगत स्पर्धा में एक स्वर्ण पदक तथा दो रजत पदक मिले। भारत के १०८ साल के ओलम्पिक इतिहास में पहली बार किसी को व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक नसीब हुआ है। प्रशन यह उठता है कि आख़िर अभी तक भारत में किसी को व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक प्राप्त क्यों नही हुआ?
जहाँ तक मेरा मानना है वह यह है कि इसके पीछे सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। वर्ष २००५-०६ में ४३८.९९ करोड़ रुपये का बजट खेल के लिए प्रस्तावित किया गया था। लेकिन ३८६.१० करोड़ ही स्वीकृत किया गया। यही हालत २००६-०७ की भी रही। इस साल ४५७.२० करोड़ ही दिया गया वह भी यह rashtra मंडल खेलों की तैयारी के लिए है। कहने को तो २००७-०८ में ७०० करोड़ का प्रावधान किया गया है जिसमें से २३७.५१ करोड़ राष्ट्र मंडल खेलों तैयारी के लिए है ।
भारत में राष्ट्रीय खेल का आयोजन हर दो साल पर किया jaanaa था। लेकिन ऐसा नही है। पिछले साल असम के गुवाहाटी में हुए ३३वे तथा हैदराबाद में हुआ३२वे राष्ट्रीय खेल में ५ साल का अन्तर था। इसी तरह ३० वें और ३१ वें राष्ट्रीय खेल में तीन साल तथा २८वेन और २७ वें राष्ट्रीय खेल में ७ साल का अन्तराल रहा । भारत में राष्ट्रीय खेल कभी पास हुआ है कभी फेल। ऐसी स्थिति में भारत के लिए यह पदक क्या हैभारत में खेल का आधार ही कमजोर है। वर्ष १९८४ में बने भारतीय खेल प्राधिकरण के तहत जिला स्तर की हर प्रतियोगिता के लिए ३० हजार तथा राज्य स्तर की हर एक प्रतियोगिता के लहै रुपयों का प्रावधान किया गया है ही ऊट के मुह में जीरे के सामान है। खेल प्रशिक्षकों की संख्या देखी जाए तो भारत में एक जिले के लिए केवल ३ प्रशिक्षक ही है । ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले अभिनव बिंद्रा तथा कांस्य पदक जीतने वाले सुशील और विजेंद्र ने यह स्पष्ट कर दिया की भारत में आज भी प्रतिभा की कमी नही है। कमी है तो उन्हें एक दिशा देने वालों की। भारत के किसी भी जिले में खेल prashikshakon की संख्या बहुत ही कम है।
ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले अभिनव विन्द्रा तथा कांस्य पदक जीतने वाले सुशील और विजेंदर कुमार ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत में भी प्रतिभा की कमी नही है, कमी है तो उन्हें एक दिशा देने वाले की। भारत के किसी भी जिले की यह हल नही है कि वहां की खेल संस्था ठीक ले काम कर सके। खिलाड़ियों को जीतने के बाद तो पैसों से तौल दिया जाता है परन्तु जब वह तैयारी कर रहे होते हैं तब उन्हें अर्थाभाव से गुजरना पड़ता है। बीजिंग ओलम्पिक की तैयारी कर रहे खिलाड़ियों को मात्र ७५००० रुपये प्रति खिलाड़ी मिले थे। वह भी पुरी तैयारी के लिए। ऐसी स्थिति में भारत के खेल की क्या दशा होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। भारत यदि इग्लैंड में होने वाले ओलम्पिक में कुछ करना चाहता है तो उसे चीनी माडल अपनाना चाहिए। तथा खिलाड़ियों को सभी प्रकार की सुबिधा मुहैया करवाना चाहिए। जिससे पदक जीतने के बाद यह कोई न कहे कि इसके लिए मुझे इतने रुपये लगाने या खर्च करने पड़े।
गुरुवार, 4 सितंबर 2008
गुरु
दिए प्रकाश विवेक स्वरूप
मैं अनजान रहा रवि की किरणों से
वह किरण आप ने दिखलाई
पढ़ा करके पाठ ज्ञान शील एकता
हम सबमें एक नई ज्योति जगाई
अन्धकार मय मोहित जग में
मै फसता ही जाता था
पाकर के स्नेह आप का
मैंने कुछ किरणें हैं देखा
बस यही कमाना है मेरी -२
यह रूप हमेशा बना रहे
हम जैसे नव आगंतुक को
एक छाया हमेशा मिलाती रहे।
ऐसे भी हैं लोग
बिना भोजन किए
चारों तरफ़ पानी है, पर
बिना पानी के।
मै छत पर खड़ा रहा
कई दिनों तक
इस उम्मीद में की
इन्द्र थोड़ा दया कर दें
एक के ऊपर एक सामान रखता गया
लेकिन अब हाय! कैसे बचूं ........... ।
सोमवार, 19 मई 2008
क्योंकि जिन्दगी इसी का नाम है.
हार कर भी खुश रहना हमारा काम होता है।
दूसरों को छल कर बहुत धनवान होते हैं
खुशी का इक लफ्ज भी उन्हें दुश्वार होता है।
हार गए यदि सारे दांव, छल गया तुमको संसार
खुश होकर अब रहना सीखो,
डरने से अब क्या काम
देखे बहुत है जहाँ में इन्साँ को
सभी तन्हा, सभी उदास नजर आते हैं।
बहुत है जो इक बाजी हारने के बाद हार मै लेते हैं।
दूसरे इसे जितने को उत्सुक नजर आते हैं।
उनके लिए हारना और जीतना ही जिन्दगी है
क्योंकि यही हार और जीत ही जिन्दगी का नाम है।
महगाई
घर में तो सभी खुशहाल हैं।
फ़िर भी तोरी की तरह क्यों खस्ता हाल है।
पगार बढने को सुनकर तो चेहरा बड़ा लवलीन था
फ़िर क्यों आज यह सुखाया फूल है।
किसान कहते हैं, मजदुर कहते हैं,
या यूं कहे कि सभी कहते हैं
जो अपना व्यवसाय करते हैं।
सरकार तुम्हारी पगार बढाये
हम अपनी बढा लेगे
फ़िर महगाई का रोना क्या रोना
चाहते क्या हो धनवान होना न
सो तो हो गए
अब पैसा क्या करोगे रखकर
अरे भाई! महगाई है उसे खर्च देना
जैसे थे वैसे ही रहोगे।
वह मुझसे बहुत प्यार करती है
सभी का प्यार करने का अंदाज अलग-अलग होता है। मैं उसे जितना मारता हूँ उतना ही प्यार भी करता हूँ। वह मार खाने के बावजूद मेरे पास ही रहती है। लेकिन खाने की कोई वस्तु किसी को नही देती है। मुझे भी। उस दिन पता नही उसके दिमाग में क्या बात आई कि वह सेब का एक टुकडा लेकर मेरे घर आ गई। उस समय मेरी माँ भी मेरे पास आई हुई थी। उसने सेब को लेकर आते ही मेरी माँ से कहा" उमेथ भइया " मैं किसी काम से बाहर गया हुआ था । माँ ने कहा दिया वह बाहर गए हैं क्यों?
वह इसे समझ तो नही सकी पर खड़ी रही। मेरे पिता जी भी घर पर ही थे। माँ ने कहा "मुक्कू इसे मुझे दे दो" फ़िर उसने कहा" नही भइया " उसे इतना विश्वास दिलाने की कोशिश की गयी कि मैं तुम्हारे भइया को दे दूंगी। परन्तु वह नही मानी। अंत में माँ ने कहा अच्छा रख दो जब भइया आयेंगे तो खा लेगें। वह ख़ुद बेड पर चढकर एक आलमारी पर रख देती है । लेकिन मेरे माता-पिता को नही देती है। उसे इस बात का विश्वास ही नही था कि ये उन्हें दे देगें। उसे वह मुझे देना चाहती थी, मगर क्या करे। बाद में उसने मुझसे कुछ कहा तो नही परन्तु उसका चेहरा देखकर मैं समझ गया कि वह मुझसे नाराज है। उसकी नाराजगी दूर करने का उपाय यही है ही कि उसे गोद में उठा लो। मैंने उसे उठा लिया और वह खुश हो गयी।
कृषक की दास्तान
आप ने यह क्या शितम ढाया है
कोई मेरे दुःख का तो साथी नही था
आप पर ही तो हमें विश्वास था ।
छः महीने से -छः महीने से इंतजार था
घर में आनाज आएगा,
हमें भी एक दिन गम से निजात मिलेगा।
महीना चैत का और गेहूं खेत में पके हैं।
घर में एक दाना नही है
और यह
बेवक्त बारिस का कहर
क्यों ढाया है आपने
सच है
विपत्ति में आप भी हमारे नही हैं।
आप तो ऐसे नही थे
फ़िर क्यों किया यह विश्वासघात
हमें आपहिज क्यों बना दिया
इसीलिए कि हम बेबस हैं न ।
ये कैसा लोकतंत्र
आजादी का गीत गाकर
अपने मन को संतोष दिलाएं। आओ....... ।
सरकारें बदलती रही कुर्सी वही रही
जनता के उपर पुलिस भी मेहरबान रही।
कैप्टन हों या बादल दोनों नेता ही हैं।
पुलिस उनकी लाठी और जनता भैस है
अपना हक मांगना, और न मिलाने पर रोष करना
उनके लिए गलत बात है
नेता जी बोले चुनाव के समय -
महिला देश का आधार हैं,
लोकतंत्र में उनकी अलग पहचान है
सरकार हमारी होगी तो कष्ट दूर तुम्हारे होंगे
पर हाय
सरकार तो बन गई बादल की
और हमें झुनझुना दे दिया
कह दिया
बच्चों बजाना मना है।
अधिकार संविधान में है
पर
मांगना मना है।
रविवार, 18 मई 2008
घर के चिराग से लगी आग
आये दिन सरकार नशीले पदार्थों के व्यापार को रोकने के लिए बनती है। कानून बनाकर उसकी धज्जियाँ उड़ना भी उसे अच्छी तरह से आता है। कानून बनने वाले अपने को कानून का बाप समझाते हैं और कानून को अपना बेटा। अर्थात मैं इससे बड़ा हूँ तो क्यों न इस पर शासन करूँ। अकाली दल के एक नेता ने जिस प्रकार से हेरोइन को एअरपोर्ट पर ले जा रहा था और पकड़ा गया। यह अनुमान लगाया जा रहा हैं कि वह करीब २२किलो ७५०ग्राम थी। अर्थात लगभग २२करोड रुपये की। यह बात अच्छी हैं कि उसे पुलिस वालों ने नही पकड़ा नही तो एक ही डाट मैं छोड़ दिए होते। ये वही नेता महाशय हैं जो विधानसभा में इस बात पर जब बिपछ में होतें हैं तो सरकार की आलोचना करते हैं।
कभी-कभी ऐसा लगता हैं कि अवैध नशीले पदार्थ का व्यापार करने में राजनेता के प्यारे ज्यादा ही उत्सुक हैंसंइया भइल कोतवाल, अब डर कहे का।" इस बात को सार्थक सिद्ध करना उनके बाएं हाथ का खेल लगता हैं। आखिर कब तक घर का ही चिराग घर को जलाएगा। जहाँ तक इस देश के बार में मैंने समझा हैं वह यह हैं कि यहाँ अगर किसी बात को खुली छोड़ दी जाए तो शायद वह रुक सकती हैं।
एक बार मेरे गाँव में एक जादूगर जादू दिखाने आया था। मंगलवार का दिन था। बाजार लगी हुई थी। मै अपने एक अध्यापक महोदय के साथ गया था। सभी लोग वहां बच्चों से कह रहे थे पीछे-पीछे और पीछे हटो। बच्चें आगे बढते जा रहे थे। ये महोदय पहुचते ही कहा और आगे बढो। बच्चे पीछे लौटने लगे। मुझसे रहा नही गया। मैंने पूछे लिया आखिर आप आगे बढने को क्यों कहा रहे हैं। उन्होंने बताया कि ये सोच रहे हैं कि लोग हमें आगे बढने से मना कर रहे हैं कि आगे कोई डर नही हैं। इन बातों का उल्टा असर अधिक होता हैं। इसीलिए आगे बढने को मैंने कहा था। इस बात को मै कई जगह पर सत्य होते देख चुका हूँ।
मैं सोचता हूँ कि अगर इस पर से भी सरे बंधनों को हटा दिए जाए तो शायद नशीले पदार्थों का कारोबार कुछ लोग ही करेगें और अधिकतर इससे बच सकते हैं। कम से कम हमारे नेता तो इस मुहावरे से निजात पा ही जायेगे कि "Ghar का ही चिराग घर को जला रहा हैं।"
गुरुवार, 15 मई 2008
याद आ गयी
मुझे मेरी प्रेमिका याद आ गयी।
जब कभी तुमसे बातें हुई तो
उसके साथ हुई बातें याद आ गयी।
निकलता हूँ जब कभी कालेज के लिए
तेरी मुलाकात से उसकी मुलाकात याद आ जाती है।
चाहता बहुत हूँ भूल जाऊ उसे पर
भुलाने के बहने वह याद आ गयी।
कभी-कभी तो तुमको मुझसे गुस्सा होना
मुझे उसके रूठने की याद दिला जाती है।
जब तुम मुझसे बहुत दूर होती हो तो
दिल की तस्वीर में चेहरा देखा तुम्हारा और वह याद आ गयी।
मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008
नारी तेरी महिमा
हे कानून के निर्माता! देश के भाग्य विधाता! लड़कों पर भी जरा रहम तो कर दो। हमें भी संसार की आजादी का लुफ्त तो उठाने दो। क्यों हमे जोरू का गुलाम बना रहे हो। सभी से आजाद होकर भी हम स्त्रियों के गुलाम हैं। घर में रहना है तो चरणों को धोकर सीता के राम को पीना है।
हे नारी! दुनिया के शासनकार- तेरा शासन है संसार में। हमको तो लूट लिया है अपने वालों ने। गोरे-गोरे गालों ने काले-काले बालों ने। अब आप हमें लूटे न। सरदार की तरह यह कह दें कि ऐ गाँव वाले मर्दों जो तुम्हारे पास हो उसे इज्जत से निकल कर मुझे दे दो अन्यथा मै तुम्हें हवालात के अंदर करवा दूंगी। आज के कानून के आगे हम भीगे चूहे की तरह आप के आगे आ जायेगें फिर जो मर्जी करो।
हे जन्मदायिनी माता! तुम माता भी हो पत्नी भी हो, बहन और भाभी भी हो। तुम्ही भाग्य की निर्माता भी हो और हमें हवालात पहुचने वाली भी। हम तो तेरे गुलाम हैं सदियों से यह मत समझो कीआज से हम तो उस कुत्ते के समान के हैं जो घर की रखवाली करे और खाना न खाए। हे लेडी तुम चाहे लात से मरो चाहे गाली दो । मै हाथ नही उठाऊगा क्योंकि तुम मालिक हो और मैं आपक गुलाम।
हे विधि के निर्माता! एक और कानून मत बना देना। महिला आरक्षण में हमen निरक्षर न बना देना हम तो आप के दया के पात्र हें तुम जेसा चाहो कानून बनाओ हम न नही कर सकते हैं।हम विरोध नही कर सकते हैं। तुम भी तो देवी की पूजा करती हो वाही विरोध कर सकती है। मगर कैसे? तुम तो उन्हीं के पक्षधर ही हो।
हे संविधान के निर्माता! तुम्हारी भी गलती कहें तो हम खुद ही गलत हैं। आज चौराहों पर बेचारे निर्दोषों को पीट रहे हैं। क्योंकि एक लडकी ने उसे मारा था वह भी सड़क पर तो हम तुम्ही से गिला-शिकवा करें। हम तो अपने से भी नही कर सकते हैं। जब महारानी को दुनिया सुन रहा है तो इसे एक पुस्तक में लिखने में कोई बुराई नही है। तुम भी सही ही हो।
हे अबला! अब तुम्हारी कहानी बदल रही है। अब तो tumhaare अंचल में दूध नही वह तो क्या है हमें खुद ही नही मालूम है। तुम अब अबला कहाँ हो तुम तो अब मर्दों को भी पीछे पीछे छोड़ रही हो अबला तो अब मर्दों को कहे। अब उनके अन्दर इतनी ही क्षमतानही है कि वह आप से बराबरी कर सके ।
रविवार, 3 फ़रवरी 2008
दुनियादारी
आज मुझे है सैर पर जाना

घर में रहना महल, में सोना ,
मुझको नही सुहाता है
मैं भी दुनिया देखूं भला
मेरी बात न जाये टाली
राजा के yaron ने इसका बिरोध किया
राजा ने सबको यह समझाय दिया
तुमको भी दुनिया देखने का
ऐसा मौका न जाय चला
हम सबको धन देकर
दुनिया का सैर कराउगा
राजा की बातों को सुनकर
कुछ ने सोचा की मेरा काम बना
इसी बहाने धन की तो
आने की है राह बना
भेज दूंगा किसी और को
तो क्या मेरा जाएगा
बदले में सैर नही पर
धन का भंडार भर जायेगा।
सब तेरा है
बस आँख उठा कर देखो तो
तू ही महान, तू ही दयावान
तू ही है सब का आसमान
लेकिन इस दुनिया में हमने
तेरे कई रुप हैं देखे
कहीं प्यार, कहीं तकरार
कहीं ये दोनों हैं ख़बरदार
अत्याचार बढे दुनिया में
हाथ तुम्हारे कभी न कापे
दुनिया में आने से पहले
तुने ही है मार दिए
धन्य नारी! तेरी ये महिमा
तुझमें अब दुनिया का रहना
रोओगी अपनी करनी पर
पानी नही तुझे है मिलना।
शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008
जो सभी को चाहता है।
उतावला खड़ा है
अपनी बाँहों को फैलाये
स्वागतम कह रह है
तुम उससे प्यार करो या न करो
पर
वह तुम्हारा सच्चा प्रेमी है
आज नही तो कल
वह तुमसे जरूर मिलेगा
पर
कोई निश्चित स्थान नही
तुमसे मिलने के लिए
तुम्हारे घर भी आ जाएगा
बिना पते का ही
रास्ते में भी मिल सकता है
फिर
प्यार से उठा कर साथ ले जाएगा
अपने घर को
और तेरा आदर-सत्कार
वह खूब करेगा।
मंगलवार, 1 जनवरी 2008
सभी मस्त है तुम्हे चूम लू

आ आज पूरे दिल से
तुमसे मुहब्बत कर लू
तू दूर जा रही है
तेरा आज मैं स्वागत कर लू
कल सभी नये सूर्य का स्वागत करेगें
सभी हैप्पी न्यू इअर कहेगें और
तुझे भुलाना चाहेगें
इसलिए
ओ दूर जाने वाले
तेरे लिए दो बूंद आसू गिरा लू
इस जिन्दगी में तू अब मिलेगा नही
बस एक याद ही छोड़ जाएगा
एक बार फिर तेरे गले लग लूँ
आ आज मैं तेरा स्वागत कर लूं।
