गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

आया मौसम गरमी का

आया मौसम गरमी का
आइसक्रीम और तरबूजे का
सब कहते है गर्मी बहुत है
लेकिन मजा तो इसी में है
कहीं भी रात बिता लो भाई
न बिस्तर कि चिंता न चादर की जरुरत
कहीं भी सो जाओ
खाने की भी चिंता न करो
शादी का मौसम है ये
एक कपडा अच्छा सा रख लो भाई
कहीं भी पहुँच कर पार्टी मना लो
कितना प्यारा मौसम है
इसे बुरा न कहो भाई

यहां सब नंबर एक हैं

किसी भी प्रतियोगिता में पहला स्थान तो सभी प्राप्त करना चाहते हैं लेकिन क्या अपने कभी इस बात पर सोचा है कि सभी पहले स्थान पर हो भी सकते हैं। वह भी एक ही समय में। नहीं न। आइए हम आपको बताते हैं एक ऐसी दुनिया की कहानी जहां अधिकतर लोग पहले स्थान पर हैं। इस दुनिया का नाम है मीडिया की दुनिया। मेरा मतलब खबरों की दुनिया। यहां कोई भी दूसरे स्थान पर रहना पसंद नहीं करता है। हमें चाहिए तो पहला स्थान ही चाहिए। ये कितने भी दो नंबर के धंधे करें लेकिन रहेंगे पहले ही स्थान पर।


मध्यप्रदेश साहित्य, संगीत और षिक्षा का केन्द्र माना जाता है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की तो बात ही निराली है। कम से कम 15 हिंदी दैनिक यहां से निकलते हैं जिनकी शाखाएं पूरे हिन्दुस्तान में नहीं हैं तो भी दिल्ली में तो हैं ही। इन 15 में सभी पहले स्थान पर ही बरकरार हैं। इसको समझने के लिए खेल का उदाहरण लिया जा सकता है। खेल एक ऐसा शब्द है जो हॉकी के लिए भी प्रयुक्त होता है तो क्रिकेट के लिए भी। लेकिन सभी खेलों में कोई न कोई पहले स्थान पर रहता है। वही हाल भोपाल की मीडिया का है। यहां कोई पाठक संख्या में पहले स्थान पर है तो कोई बढ़त में पहले स्थान पर है। कोई नंबर एक उभरता हुआ अखबार है तो किसी में नंबर एक है। हद तो यह हो जाती है कि कोई समाचार पत्र अपने को विज्ञापनों में पहले स्थान पर रखना षुरु कर देता है।


अरे भाई हम समाचार पत्र क्यों खरीदते हैं। विज्ञापन देखने के लिए या खबरों को पढ़ने के लिए। भास्कर एक ऐसा समाचार पत्र है जो अपने को विज्ञापन में प्रथम स्थान पर बताता है। भविष्य में अगर पत्रकारिता का इतिहास लिखा जाएगा तो एक बात यह जरुर लिखी जाएगी कि भारत का पहला विज्ञापन समाचार पत्र भास्कर है। क्योंकि यह खबरों की अपेक्षा विज्ञापन को ज्यादा महत्व देता है। यह समाचार पत्र यह मान कर चलता है कि इसके पाठक समाचार नहीं पढ़ना चाहते हैं वे तो केवल खरीददारी करने के लिए विज्ञापन देखेंगे और सामान खरीदने चले जाएंगे। देष दुनिया में क्या हो रहा है इसको इससे कोई वास्ता नहीं है।


कभी भोपाल में पहले स्थान पर रहने वाला समाचार पत्र नई दुनिया ने फिर से बढ़त करना शुरु कर दिया है। यह उसका दावा है मेरा नहीं। कौन से श्रोत से आकड़े लिए गए हैं यह बात केवल नई दुनिया को पता है और किसी को नहीं। किसी ने इसके संपादक, अरे नहीं संपादक तो कुछ होता ही नहीं है मालिक जो संपादक से भी बड़ा है से कह दिया कि इसकी पंच लाइन सबसे ज्यादा बढ़ता हुआ अखबार लिख दो और इसने लिख दिया। पाठक तो कुछ समझता ही नहीं है। हां इतना जरुर है कि ये मीडिया वाले आम नागरिक को भेड़-बकरी समझते हैं। अब जब यह समाचार सबसे ज्यादा बढ़ रहा है तो सब इसे खरीदेंगे। क्योंकि एक भेड़ जिधर जाती है उसी ओर सभी भेड़ें चल देती हैं। पर क्या करें। ये आदमी निकले। ये एक ही रास्ते पर नहीं चालते हैं। यहां तो सही पर भी बहस होती है। तो झूठ को लोग कैसे स्वीकार कर लेंगे। लोग तो षायद न ही चलें इस रास्ते पर लेकिन जब समाचार पत्र अपना वितरण बताएगा तो यह जरुर बताएगा कि उसकी पाठक संख्या पिछले एक साल में इतनी बढ़ गई है। यही हाल कुछ अन्य समाचार पत्रों का भी है।


पहले स्थान पर बनने के लिए ये समाचार पत्र कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। स्थान पहला होना चाहिए चाहे वह किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो। यही हाल रहा तो आने वाले समय में कुछ समाचार पत्रों की पंचलाइन कुछ इस प्रकार होंगी- झूठी खबरें परोसने में पहला स्थान, खबरों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने में पहला स्थान, सही खबरें छिपाने में पहला स्थान। आखिर रहना है पहले स्थान पर तो कुछ भी किया जा सकता है। जब कोई विज्ञापन में पहला स्थान लिखकर गौरव स्थापित करना चाहता है तो इसमें क्या बुराई है। यह पत्रकारिता की आत्महत्या नहीं गलत हो जाएगा ‘‘हत्या’’ है जिसके लिए कौन जिम्मेदार है। जब से पत्रकारिता कॉरपोरेटों के हाथों में गई है वह अपना वजूद खोती जा रही है। यदि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो इसके परिणाम भविष्य में बहुत ही खतरनाक हो सकते हैं।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

तुम याद आओगे

अन्ना तुम याद आओगे। वह और वक्त था जब देश आजाद था आज भी आजाद है और कल भी रहेगा पर इस आजादी का रूप क्या होगा सवाल इस पर है आजादी पर नहीं जरा सोचो हम भी आजाद हैं। लेकिन कहाँ है वह आजादी जिसके लिए लड़े थे देश के वीर जवान भ्रष्टाचार, दुराचार, के भेंट चढ़ गयी है सारी आजादी ऐसे में अन्ना तू ही तो काम आया है.

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

जरूरत कानून की नहीं,जरूरत अमल करने की है

भारत का संविधान दुनिया के सभी संविधानों से बड़ा है जिसमें बहुत से नियम कानून भरे पड़े है। किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए ये कानून मेरी नज़र में प्रयाप्त हैं। लेकिन सही से इन्हें प्रयोग में ना लाने के कारण समस्याएँ पैदा हो रही है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जन लोकपाल विधेयक की माँग करते हुए प्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने लगभग 94 घंटे का उपवास रखा। सरकार ने उनकी सभी माँगो को मान भी लिया है। इससे क्या होने वाला है ? क्या ये भी संविधान पुस्तिका में जा कर दफन हो जायेगा या इसके कुछ ठोस परिणाम भी मिलेंगे। ये तो आने वाला समय ही बताएगा। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकार ने कई एजेंसियाँ जैसे सीवीसी,सीबीआई,आईबी,सीआईडी का गठन किया है। लेकिन इनके प्रमुख के पद पर जिन्हें नियुक्त किया जाता है वे स्वंय भ्रष्टाचारी होते है। अगर हम एक नज़र सीवीसी प्रमुख पीजे थॉमस पर डाले तो इससे साफ नज़र आता है कि ये संस्थाएँ साफ नहीं है। अपने बचाव के पक्ष में थॉमस ने कहा था कि योग्यता में कहीं भी नहीं लिखा था कि अभ्यार्थी भ्रष्ट ना हो। तो क्या इससे यह समझना चाहिए कि अब वह समय आ गया है जब यह भी लिखना पड़ेगा। लोकपाल बिल बनाने से ही सब कुछ नहीं हो जाएगा। जरूरत है बनाए गए कानून का सही तरीके से अमल हो।

गुरुवार, 31 मार्च 2011

आओ खेलें होली




आओ होली खेलें दिल खोल के ..................

शनिवार, 26 मार्च 2011

इस रंग बदलती दुनिया में

इस रंग बदलती दुनिया में
इन्सान कि नियत ठीक नहीं
निकला न करो तुम सज धज कर
इमान की नियत ठीक नहीं।
कुछ ऐसी ही नियत हमारे देश के नेताओ की हो गयी है। कोई भी इस हमाम में बचा नहीं है। सब के सब नंगे हो गये है। हमारे देश के प्रधान मंत्री को कुछ पता ही नहीं होता है कि क्या हो रहा है और सब अपनी अपनी गुल खिलते रहते हैं।
देश वासिओ! अब आपलोग भी अपनी नियत बदल लो या तो सजधज के निकलना बंद कर दो नही तो कब तुम्हारी इज्ज़त लुट जाएगी पता भी नहीं चलेगा।

शनिवार, 12 मार्च 2011

आखिर जनता ने ही उठा ही दी आवाज



मिस्र में जनता की आवाज को दबाने की जितनी भी कोशिश तत्कालीन सरकार ने कीआवाज उतनी ही बुलंद होती चली गई। नतीजा अब सब के सामने है। हुस्नी मुबारक को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा तथा साथ ही साथ देश निकाला भी मिला। वह जनता की ही आवाज थी जो इस करिश्में को कर दिखाई है। वही जनता अब अरब देशों में भी अपनी आवाज को उठा रही है। तो भारत की जनता कैसे पीछे रह सकती है। भारत के नागरिकों ने भी अपनी आवाज उठानी शुरु कर दी है। वह चाहे बहुत ही निचले स्तर से क्यों न हो। एक न एक दिन देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, लापरवाही, लालफीताशाही के खिलाफ जानता को अपनी आवाज उठानी ही थी। श्री श्री रविषंकर ने कह ही दिया है कि देश आज के नेतओं के बल पर नहीं चल सकता है। देश को जरुरत है ऐसे नेताओं की देश सेवा का केवल सपथ ने ले उसे कर दिखाने का जब्जा भी अपने अंदर विकसित करें।
मायावती शासित राज्य उत्तर प्रदेश में आखिर कर जनता ने अपनी आवाज को बुलंद कर ही दिया। बसपा के 54 विधायकों के उनके निर्वाचन क्षेत्र के नागरिकों ने ही रपट दर्ज कराने की मांग एक ऐतिहासिक पहलू बन सकता है। ऐसा भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार हो रहा है कि किसी राज्य के नागरिकों ने अपने ही चुने प्रत्याशी पर उंगली उठाई हो। इससे एक चीज जो सिद्ध होती है वह यह है कि देश की जनता और खास कर बिमारु राज्यों के रुप में जाना जाने वाला उत्तर प्रदेश की जनता अब अपने अधिकारों के लिए जाग उठी है। उसे यह हवा कहां से मिली इसका तो पता लगाना संभव नहीं है। लेकिन यह एक साकारत्मक पहल है।
उत्तर प्रदेश की जनता ने अपने जिन विधायकों पर उंगली उठाई है उनमें सभी के सभी सत्ता के विधायक हैं। सत्ताधारी विधायक सत्ता के नशे में यह भूल जाते हैं कि जनता ने उन्हें किस लिए विधानसभा या लोकसभा में भेजा है। शिकायतों में सबसे अधिक मुरादाबाद मंडल के विधायकों पर है दूसरे स्थान पर मेरठ मंडल के छह विधायकों पर जनता ने विरोध दर्ज कराया है।
जनता के इस विरोध को देखते हुए सरकार को चाहिए की वह अब ऐसा विधायक पारित करे जिससे जनता अपने निर्वाचित प्रत्याशी को वापस बुला सके। अगर सरकार जनता के इस रुख को नजर अंदाज करती है तो उसे इसके बहुत बुरे परिणाम भोगने पड़ सकते हैं। मायावती जहां प्रदेश के जिले-जिले में घूमकर अपनी छवि को सुधारने की कोशिश कर रही है वहीं इससे उनकी छवि और धुमिल होती जा रही है। अपने प्रवास के दौरान मायावती क्या दिखाना चाहती हैं यह तो उनके भ्रमण के बाद वहां पर घटित घटना से साफ नजर आता है। उनके जाने से पहले ही उस क्षेत्र में मीडिया और नागरिकों को प्रतिबंधित कर दिया जाता है जहां उनका भ्रमण होना है। यह केवल जनता में दहशत पैदा करने का काम हो सकता है। इसका ताजा उदाहरण बुलान्दशाहर में देखने को मिला। मायावती अपने दौरे में बुलंदशहर गयी और वहां के प्रशासन ने उनकी सुरक्षा के इतने कड़े इंतजाम कर दिए कि "गीता बाल्मीकी" को अपनी जान गवानी पड़ गई। शहर में एक ओर मायावती के जिंदाबाद के नारे लग रहे थे और सीएम साहिबा तहसील के अभिलेख और अस्पतालों में मरीजों के हाल जानने के लिए जाने वाली थी। इसी ने अस्पताल की व्यवस्था में ऐसा परिवर्तन कर दिया कि आम नागरिक अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दे। अब ये मायावती हैं उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल तो हैं नहीं जो यह कह दें कि मेरे काफिले के लिए इतने प्रोटोकाल की आवश्याकता नहीं हैं। इन्हें तो केवल भूख है तो अपनी ताकत को दिखाने की उसकी कीमत चाहे जो हो।
2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में मायावती का प्रदेश दौरा उनकी छवि को कितना निखरता है यह देखने लायक होगा। कुछ भी हो , पिछले पांच सालों में जनता ने सत्ता पक्ष से जितनी परेशनी झेली है उतनी उसे किसी और से नहीं झेलनी पड़ी है। विधायकों के बुरे आचरण की खबरें उनके शासन काल में पूरे पांच से आती रही हैं। कहीं किसी विधायक ने कुछ किया तो कहीं किसी ने कुछ। पैसा ने देने पर इंजीनियर की हत्या तो जन्मदिन पर नोटों का हार। दौरे पर एसपी साहब जूती साफ करते हैं तो जन्मदिन पर डीआईजी साहब केक खिलाते हैं। पूरा का पूरा सरकारी कुनबा ही लगा है जी हजूरी में। इस दहशत में किसी राज्य की जनता कब तक रह सकती है। सरकार के गुलाम सरकारी कुनबा हो सकता है लेकिन जनता नहीं। शंखनाद जनता को करनी है जो वह कर चुकी है।

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

सवाल धर्म परिवर्तन का है जी!

धर्मपरिवर्तन का सवाल किसी के मन में क्यों उठता है इस बात को समझना तथा उन्हें दूर करना जरुरी है। एक साधारण सा आदमी अपना धर्म बदल लेता है। कुछ मामलों में इसे जबरदस्ती परिवर्तन माना जा सकता है कुछ में लालच को लेकिन सभी मामलों में ऐसा ही होता है यह सही नहीं है।
हमारे देष के नेताओं को किसी के दुःख दर्द की कोई परवाह नहीं है परवाह है तो केवल इस बात की कि हमारी राजनीति कैसे चलती रहे, हम समाचार में कैसे बने रहें। यह सही है कि देष में अब केवल धर्म परिवर्तन ही नहीं राष्ट्र परिवर्तन की बात भी चल रही है। केवल झण्डा फहरा देने से कोई भारत का अंग बन जाएगा तो इसे माना नहीं जा सकता है। कष्मीर के लोगों की क्या समस्या है उसे समझना तथा उस अनुसार उनकी परेषानियों को दूर करने की कोषिष होनी चाहिए। ‘‘राष्ट्रीय एकता यात्रा’’ में जितने लोगों ने भाग लिया में उस पर कोई सवाल न उठाते हुए केवल इतना कहना चाहता हूं कि वही लोग इस बात को वहां जाकर बिना किसी हो हल्ला किए वहां के लोगों के परेषानियों को समझें और इस पर विचार करें इसे कैसे दूर किया जा सकता है।
भाजपा या आरएसएस को धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए अगर कुछ करना है तो उसके लिए महाकुंभ का आयोजन करने की कोई आवष्यकता नहीं है। धर्म परिवर्तन करने वालों के मनोभावों को समझे तथा उनकी समस्याओं को दूर करने की कोषिष करें। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कोई भी साधारण मनुष्य सामान्य परिस्थितियों में अपना धर्म बदलना पसंद नहीं करता है। जहां तक मुझे लगता है धर्म परिवर्तन से पहले लोग को अपने भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में बहुत सोचना-विचारना पड़ता है।

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

युवाओं के देश में युवाओं का स्थान

भारत युवाओं का देश है। हमारे देश में युवाओं की संख्या लगभग 56 प्रतिशत है जो दुनिया के सभी देशो से अधिक से अधिक है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन युवाओं की वर्तमान स्थिति क्या है और इनका भविष्य क्या होगा। देश केवल युवाओं से विकास की डगर पर आगे नहीं बढ़ सकता है इसके लिए आवष्यक है कि उन्हें सही दिशा-निर्देश मिले और अवसर मिले। अर्थशास्त्रीयों का मानना है कि जनसंख्या दुधारी तलवार की तरह होती है अगर उसका सही से इस्तेमाल नहीं किया जाता है तो वह इस्तेमाल करने वाले का भी गला काटने से हिचकती नहीं है। भारत के हाथ में यह जो तलवार है यह भारत को विकास के मार्ग पर आगे ले जाएगी या विनाश के गर्त में जाएगी इस पर विचार करने का समय आ गया है।
बेरोजगारी का अंदाजा इसी बात लगाया जा सकता है कि एक एमबीए करना वाला उत्तर प्रदेश में होमगार्ड के लिए आवेदन कर रहा तो एक बरेली से आईटीबीपी की भर्ती के लिए 410 सीटों के लिए लाखों लोग जा रहे हैं। एक चपरासी की भर्ती निकलती है तो उसके लिए भी सुशिक्षित लोग अपना आवेदन करने में नहीं हिचकते हैं। ऐसी कोई एक दो खबरें नहीं हैं कि उन्हें गिना जा सके देश में आए दिन ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं।
युवाओं के नाम पर तो भारत में चुनाव तक लड़ा जा रहा है। हर दल का अपना एक युवा संघ है जो युवाओं की बात करता है। आज ही नहीं इतिहास के हर कालखण्ड में ‘युवापन’ और ‘युवाजन’ की महत्ता को स्वीकार किया जाता रहा है। समाज ने इन्हें अपनी ताकत समझा है तो राज्य ने अपना हथियार और बाजार ने अपने व्यापार का मूल आधार। लेकिन कमोवेश सब ने इन्हें अपने एजेंडे के केन्द्र में रखा है। यह अलग बात है कि इनकी आवश्यकता, आकांक्षा और भावनाओं को कितना समझा गया, इनकी कितनी कदर की गई या फिर उनके लिए कितने प्रयास किये गये, ये सदैव सवालों के घेरे में रहे हैं। सभी तरह के संघर्षं, आंदोलनों और रचनात्मक प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले ये युवाजन हमेशा अपने वर्तमान के संकट और संत्रास के सबसे अधिक भोक्ता रहे हैं।
देश की इस युवा शक्ति को राजनीतिक दल एक हथियार के रुप में उपयोग करते हैं और अपना काम निकाल लेने के बाद उनकी समस्याओं की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस समस्या के लिए अगर किसी को जिम्मेदार माना जाता है तो वह हमारी शिक्षा व्यवस्था है। शिक्षा व्यवस्था को ही हमारे देश अधिकतर विद्वान, नेता, अधिकारी यहां तक की सभी जिम्मेदार मानते हैं। आखिर यदि शिक्षा व्यवस्था में इतनी कमी है तो उसमें सुधार क्यों नहीं किए जाते हैं। हकीकत तो यह है कि देश में रोजगार के अवसर भी कम हो रहे हैं। अभी हाल ही में मध्यप्रदेश राज्य विद्युत निगम का ही उदाहरण लें। इसने आपने आधे से अधिक पदों को खत्म कर दिया है। पंजाब में बिजली को ठेके पर दिए जाने की बात हो रही है। स्कूलों में शिक्षकों की जगह पैराशिक्षकों से काम चलाया जा रहा है तो विष्वविद्यालयों में अतिथि शिक्षकों से। रिटायरमेंट की अवधि 60 से बढ़ाकर 62-65 की जा रही है और दूसरी तरफ रोजगार के अवसरों को कम किया जा रहा है ऐसे में यह कहा जाए कि केवल हमारी शिक्षा व्यवस्था में कमी है तो सही साबित नहीं हो सकती है।
कहा जाता है ‘‘जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है’’ तो हमारे देश की जवानी किस ओर जा रही है? इसका पता होना देश के नीति निर्माताओं के लिए आवष्यक है। अगर हम मध्य प्रदेश की बात लें तो अभी तक यहां केवल वृद्ध किसान ही आत्महत्या करते थे लेकिन अब युवा भी आत्म हत्या करने लगे हैं। अभी हाल ही में एक युवा मजदूर महू निवासी लगभग 24 वर्षीय रमेश कुमार ने अपने अंग को बेचने की पेश कश की। इन्दौर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी से कहा ‘‘सर मुझे आंख बेचनी और मैं कमजोर आंखे लगवा लूंगा।’’ जिस देश की जवानी अपने शरीर के अंगों को बेचने को तैयार उस देश का भविष्य क्या होगा यह तो आने वाला कल ही बताएगा। लेकिन यह तो तय है कि यदि यही हाल बरकरार रहा तो वह दिन दूर नहीं जब आत्महत्या की महामारी वृद्धों से युवाओं को बहुत ही जल्द अपनी चपेट में ले लेगा।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

केरवा डम

सबसे पहले यह बता देना उचित होगा कि यह यात्रा क्यों और किसलिए कि गयी १५ आगस्त को मेरे दोस्त श्रीश का जन्मदिन होता है और उसी पार्टी को मानाने के लिए हम लोग भोपाल के पास स्थित केरवा डम घुमाने गये उसकी कुछ तस्वीरे आपके लिए









सोमवार, 13 दिसंबर 2010

अर्विन्दम के नाम खुला पत्र

प्रिय अरविन्दम,

द सण्डे इण्डियन में नीरा राडिया और मीडीया पर प्रकाशित आपका लेख पढ़ा । नया विचार देने के लिए आपको धन्यवाद। नये तरीके से देखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन बुरा को भी अच्छा कहना बुरा है। लाबिंग के बारे में आपने जो दलीले दी है वह सही है। लबिंग एक ऐसा पेशा है जिसमें आज दुनिया के लाखो लोग है। आप vichardhara की बात करते हैं ? ओबामा को जिताने में एक टीवी चैनल का पूरा सहयोग है, यह सही है। ओबामा के लिए वह पेड पत्रकारिता कर रहा था तो क्या आप भारत में भी पेड पत्रकारिता के बुराई के पेड़ को पैदा करना चाहते हैं ? मीडिया जगत पेड पत्रकारिता को पर प्रतिबन्ध लगना चाहता है और आप हैं जो उसे बढा़ रहे हैं।

इसमें आप की गलती नहीं है। आप सभी चीजो को पैसे के साथ तौलना चाहते हैं। आप तो इसे भी बैध ठहरा सकते हैं कि हमारे सांसद पैसा लेकर सवाल पूछे। लेकिन आपके देखने का नजरिया व्यसायिक है। जहां तक मुझे लगता है खास कर भारतीय मीडिया के बारे में बहुत कम जानते है। पत्रकारिता के सम्बन्ध में एक विद्वाव ने कहा है ‘‘ कि आगर डाक्टर गलती करता है तो एक आदमी मरता है ,आगर एक वकील गलती करता है तो मामले की जांच फिर से शुरू कर दी जाती है लेकिन अगर एक पत्रकार गलती करता है तो सारा देश उससे प्रभावित होता है।

केवल अपना फायदा देखना हर जगह उचित नहीं हैं। नीरा राडिया को एक लाविस्ट मान लिया जाए तो बरखा दत्त ,प्रभूचावला और वीर संघवी भी एक पत्रकार न हो कर लाविस्ट है। अगर ये सब लाविस्ट हैं और आपने ग्रहक के लिए काम करना चाहते हैं तो मीडिया नाम का चादर ओढ़ने की क्या जरूत है। लाविगं खुद में एक व्यवसाय है। आपके दिए आकडे़ के अनुसार, इसका व्यवसाय दिन दूना रात चौगनी बढ रहा है। इन लोगो को चाहिए की मीडिया की चादर को उतार फेंके और लाविगं को अपना व्यवसाय या मैं कहूं अपना

धन्धा बना ले। भविष्य उज्जवल रहेगा और देश उस गर्त में जाने से बच जाएगा जिसमें ये लोग ले जाना चाहते हैं।

मीडिया की अपनी कुछ आचार संहिता होती है। राजेन्द्र माथुर ने कहा है कि मीडिया के लोग ही मीडिया की आचार संहिता बना सकते है कोई और अगर उसे बनाएगा तो या तो रेखा गलत खीचे देगा या हरण कर ले जाएगा। आप मीडिया और लाविंग ,लाविंग और मीडिया को एक बना कर मीडिया का हरण करना चाहते हैं लाविंग का काम है आपने ग्रहको को फायदा पहुचाना तो मीडिया का ग्रहक कौन हैं ? वे पत्रकार जो इस मामले में फंसे हैं या नहीं फसे है या आम जनता है। यदि आम जनता मीडिया की ग्रहक है तो उस को जरूर फायदा होना चाहिए। लेकिन बरखा दत्त, वीर संघवी और प्रभूचावला के इस कारनामे से किसका फायदा होने वाला है क्या आप इसे बताते की कोशिश करेगें।

अब मैं बात करना चाहूंगा की मीडिया मैन जब लाविस्ट बनते हैं तो क्या होता है?

आपने विदेशों में पसरे लाविंग के व्यवसाय का उदाहरण लेकर इस बात को समझाने का प्रयत्न किया है कि यह सही है तो उन देशों के बारे में कुछ बाते औऱ भी हैं। आप अमेरिका की बात करेंगे, इग्लैड की बात करेंगे। आप कहते हैं की वहां मीडिया संस्थान और पत्रकार लाविंग करते हैं। लेकिन शायद आरतो यह मालूम नहीं है की वहां के एक पत्रकार बिना टिकट यात्रा नहीं कर सकता है। गिफ्ट या अनुदान(घूस) नहीं ले सरता है।

किसी भी ऐसी कंपनी का शेयर नहीं खरीद सकता है जिसकी वह रिपोर्टिंग कर रहा है। अगर वह ऐसा करता है तो उसे अपनी बीट छोड़नी पड़ती है या फिर संस्थान के बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। वहां तो व्यवस्था यहां तक है कि कोई पत्रकार किसी पार्टी को कवर करने जाए तो भी वह अपना बिल खुद चुकाए। जरा सोचिए।

एक पत्रकार ऐसे में लाबिंग कैसे कर सकता है। हां दलाली जरुर कर सकता है। क्योंकि दलालों को नौकरी की चिंता नहीं रहती है। पत्रकारों को अपने चरित्र के बारे में सोचना पड़ता है। लाबिंग करने वाले अलग लोग होते हैं और मीडिया में काम करने वाले अलग लोग होते हैं। अगर एक ही आदमी से ऑपरे भी करवाओगे और पूल का क्शा भी बनवाओगे तो वह दोनों ही काम गलत करेगा। जिसका ऑपरे कर रहा है वह तो मरेगा ही और वह पूल भी ज्यादा दिन तक नहीं चल पाएगा और उससे भी लोग मरेंगे ही। अच्छा हो एक आदमी एक ही काम करे। प्रभु चावल, बरखा दत्त और वीर संघवी ने एक साथ दो काम हाथ में लिए लेकिन आज वो कहीं के नहीं रहे। अच्छा है यह हिंदुस्तान है कि उन्हें बाहर का रास्ता नहीं दिखाया गया केवल पदभर को कम किया गया है। भारत में भी लाबिंग का व्यवसाय फले-फूले इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। लेकिन लाबिंग करने वाले इस व्यवसाय के हों। अन्य देशों की तरह हमारे दे में भी लाबिंग को स्थान मिले। मीडिया के लोग अगर लाबिंग करेंगे तो मीडिया का जो काम है उसे कौन करेगा। क्या कोई मीडिया कर्मी इस बात को सोच सकता है कि जिससे उसे काम निकलवाना है उसके खिलाफ कुछ भी छाप सके।

पत्रकार या तो पत्रकारिता करे या लाबिंग करे। दोनों एक प्रकार से व्यवसाय ही हैं। और इनमे से एक को उन्हें चुनना चाहिए। क्यों कुछ लोगों के फायदे के लिए पूरे समाज को गर्त में धकेलना चाहते हैं आप।

लाबिस्ट और पत्रकार में अंतर समझिए सहाब। दोनों को एक ही तराजू पर मत तौलिए।

आपका

उमे कुमार

एम.फिल मीडिया अध्ययन

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्नविद्यालय भोपाल मध्य प्रदे

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

स्वार्थी जनहित

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनहित याचिका एक ऐसा अधिकार है जिसके जरिए आम आदमी अपने चुने हुए नुमाइन्दों को चुनौती दे सकता है। लेकिन इसे उत्तर-प्रदेष के लोगों का दुर्भाग्य कहा जाना चाहिए कि इस बात को मानने के लिए न तो राजनेता तैयार है और न ही नौकरषाह। मायावती सरकार साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति अपना कर याचिकाकर्ता पर अपना प्रभाव जमा ही लेती है।
उत्तर-प्रदेष में मायावती के लोकतंत्र को एकतंत्र में बदल डालने के प्रयासों को अगर किसी ने रोका हुआ है तो वह सिर्फ जनहित याचिकाएं ही हैं। मायावती के सामने विपक्ष की तो एक भी नहीं चलती है। जितनी परेषानियों का सामना मुख्यमंत्री मायावती को विपक्ष से नहीं होती है, उससे कहीं ज्यादा परेषानी जनहित याचिकाओं से होती है। यदि हम पिछले कार्यकाल पर नजर डालें तो स्थिति साफ हो जाती है कि ताज कॉरीडोर मामले में अजय अग्रवाल की जनहित याचिका पर मायावती का अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
वह और दौर था जब जनहित याचिकाएं लोगों के हित के लिए हुआ करती थी। समय के साथ-साथ जनहित याचिकाएं स्वार्थी या नाटकीय होती जा रही हैं। उत्तर-प्रदेष में तो इस प्रकार का व्यापार धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। जनहित याचिका को लोगों ने अपने विकास का एक मार्ग बन लिए हैं। मायावती के मौजूदा कार्यकाल में यह व्यवसाय खूब चल रहा है। 2007 में ही ताज कॉरीडोर मामले में राम मोहन गर्ग ने एक जनहित याचिका दायर कर दी थी। इस मामले का अंत बड़े ही नाटकीय तरीके से हुआ। लालच में आकर याचिकाकर्त गर्ग ने याचिका वापस ले ली और सरकार ने उन्हें राज्य मत्स्य विकास निगम का अध्यक्ष बना दिया गया।
उत्तर-प्रदेष में जनहित याचिका का यह केवल इकलौता उदाहरण नहीं है। जब लखनऊ में खुद के बनाए अंबेडकर स्टेडियम को ध्वस्त करने के मामले में ओम प्रकाष यादव ने एक जनहित याचिका दायर की तब उच्च न्यायालय ने स्टेडियम को गिराए जाने पर रोक लगा दी। यह रोक भी ज्यादा दिन तक नहीं लगी रह सकी। याचिकाकर्ता स्वयं उच्चतम न्यायालय जाकर याचिका वापस लेने का अनुरोध किया और उसे मान भी लिया गया। बस, फिर क्या था, एक ही रात में करोड़ों की बनी इस इमारत को धूल चाटने के लिए मजबूर कर दिया गया। आखिर क्या जरुरत थी याचिका वापस लेने की। इससे पहले की यह सवाल लोगों के मन में उठता, जबाब आ चुका था। याचिकाकर्ता ओम प्रकाष यादव को राज्य निर्यात निगम का अध्यक्ष बना दिया गया। इस मामले की सुनवाई करने वाले न्यायधीष एचके सेमा को सेवानिवृत्ति के बाद उत्तर-प्रदेष मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया।
संवैधानिक रुप से यह व्यवस्था होनी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति जनहित याचिका लगा तो सकता है परन्तु अकेले उसे अपने स्वार्थ के लिए वापस नहीं ले सकता है। आखिर आज जिस व्यक्ति को काई बात बुरी लगती है वही बात कुछ दिनों के बाद उसे अच्छी कैसे लगने लगती है। जनहित याचिकाकर्ता अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए जनहित की उपेक्षा कर देता है। याचिका यदि एक बार न्यायालय में आ जाए तो उस पर उचित कार्रवाई जरुर होनी चाहिए। इससे कम से कम अपने स्वार्थ के लिए जो जनहित याचिकाएं दायर की जाती हैं उन पर रोक लग सकेगा। और न्यायालय के काम काज में तेजी आएगी तथा सही आदमी को सही समय पर सही निर्णय मिल सकेगा।

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

भारत में बदल रहे हैं विकास के मायने

वर्तमान में भारत में विकास के मायने काफी तेजी से बदल रहे हैं। विकास के सूचकांक यहां रोटी, कपड़ा और मकान न होकर खेलों का आयोजन, कॉल दरों में कामी, जीडीपी का बढ़ना, सेंसेक्स का उतार-चढ़ाव हो गया है। यदि हम वास्तविक विकास की ओर ध्यान देते हैं तो भारत की स्थिति काफी नाजुक नजर आती है। हमारे देश में विकास के नाम पर एक राष्ट्रीय पाखंड चल रहा है। जहां देश की छवि को महान दिखाने के लिए औपनिवेशिक गुलामी के प्रतीक राष्ट्रमंडल खेलों पर तो अरबों रुपए खर्च किए जा सकते हैं, लेकिन गरीब जनता की भूख नहीं मिटाई जा सकती है।
अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के ताजा आंकड़ों से यह बात एक बार और साफ हो गई है कि विकास के रास्ते में छलांग लगाता दिख रहा हिंदुस्तान अपनी बहुसंख्य जनता का पेट भरने में पूरी तरह नाकाम है। रिपोर्ट के मुताबिक विश्व भूख सूचकांक में भारत 68 स्थान पर है। एनडीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बैठक में जब गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों को प्रति माह बांटे जाने की बात कहीं तो योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने कहा कि यह अगली योजना तक संभव नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि 2012 तक ऐसी कोई भी योजना शुरु नहीं की जा सकती है।
सरकार गरीब जनता को रिझाने के लिए उनके हित में अनेक प्रकार की योजनाएं बनाती है लेकिन उनका सही से क्रियान्वयन नहीं हो पाता है। सरकार की गरीबी रेखा से नीचे के लिए बनाई गई योजना तथा अन्त्योदय योजना का क्या हाल है यह सभी जानते हैं। सरकारी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं। सरकारी योजनाओं का यह हाल आज से नहीं है। राजीव गांधी ने भी स्वीकार किया था कि केंद्र से दिए गए धन का केवल 10 फीसद ही उस काम में लगता है जिसके लिए वह धन दिया जाता है।
देश में अगर गरीबी और भुखमरी की बात की जाए तो अर्जुन सेन गुप्ता चार साल पहले आई रिपोर्ट को देक्षा जा सकता है। इस रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि देश की 77 फीसदी आबादी हर रोज 20 रुपए से भी कम कमाती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार गरीब किसानों की आत्महत्या और भुखमरी की खबरें आती रहती हैं। ये कुछ ऐसी सच्चाइयां हैं, जो विकास की गुलाबी तस्वीर को झूठा साबित करती हैं। चिंता की बात यह है कि ऐसे में देश के विकास का वैकल्पिक मॉडल कैसे खड़ा हो, इस विमर्श की लगातार अनदेखी की जा रही है।
देश के महान नेतागण के लिए विकास का परिभाषा ही बदल गई है। विकास उनके लिए न तो देश का विकास रह गया है और न ही समाज का। विकास से उनका आशय महज अपने विकास से रह गया है। ऐसे में सोचनीय बात यह है कि सरकार विकास की जो तस्वीर जनता के सामने पेश करती है उसका आम जनता से क्या नाता है। यदि देश की सरकार को जनता की सही मायने में चिंता है तो उच्च्तम न्यायालय को बारबार यह क्यों कहना पड़ रहा है कि सड़ रहे आनाज को में गरीबों मुफ्त बांट रहे हैं। पूंजीवादियों के ब्याज को आसानी से माफ कर दिया जाता है लेकिन आम जनता के ब्याज को माफ करने के लिए अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। देश के इस प्रकार के विकास का आम जनता के लिए कोई औचित्य नहीं लगता है।

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

कांग्रेस आरएसएस की तुलना सिमी से क्यों कर रही है


अयोध्या-बाबरी मस्जिद मामले का फैसला आए अभी 20 दिन भी नहीं हुए कि कांग्रेस ने आरएसएस की तुलना सिमी से करना शुरु दिया है। इसे देष का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इतने नाजुक मामले पर भी हमारे राजनेता अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने से बाज नहीं आ रहें हैं। आज का भारत 1992 से 2010 तक अर्थात् 18 वर्षों में एक शताब्दी की दूरी तय लिया है मगर हमारे नेता आज भी धर्म, जाति, पंथ आदि का ही सहारा लेकर चुनाव लड़ना और जीतना चाहते हैं।
30 सितंबर का आए फैसले से पहले यह कयास लगाया जा रहा था कि देष एक बार फिर 1992 की स्थिति में चला जाएगा। अर्थात् धार्मिक हिंसा हो सकती है। इसके मद्देनजर सभी स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता कर दी गई थी साथ ही लोगों ने भी समझदारी का परिचय दिया और पूरे देष में कहीं भी एक भी अप्रिय घटना नहीं घटी। हमारे देष के कुछ नेताओं को यह बात रास नहीं आ रही है तो अब वे इस पर बयान बाजी करना शुरु कर दिए हैं। आरएसएस जो आजादी के पहले से ही अस्तित्व में है उसकी तुलना किसी ऐसे गुट से की जाए जिसकी छवि आतंकवाद रही हो तथा जिस पर प्रतिबंध लगा हो, देष के लोगों की भावनाओं को भड़काने जैसा है। एक-एक कर कांग्रेस के नेता विभाजन की राजनीति शुरु कर दिए हैं। कभी केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम आतंक का रंग निर्धारित करने लगते हैं तो उन्हें उसका रंग भगवा ही दिखाई देता है। भगवा हिंदुआंे का एक पोषाक होता है। आतंक का रंग भगवा बता कर देष के हिंदुओं को भड़काने का जो काम गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने किया उसे कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने आगे बढ़ाया और आरएसएस की तुलना सिमी जैसे प्रतिबंधित संगठन से कर डाली। राहुल गांधी को बहुत पहले एक बार किसी ने सलाह दी थी कि अगर भारतीय राजनीति में रहना है तो पहले अपने पिता के सभी विडियो को देख लें लेकिन शायद राहुल को इतना समय नहीं है। वह कांग्रेस के एक उभरते हुए चेहरे हैं और उनकी छवि बहुत ही साफ है तो उनको इस प्रकार का कोई भी बयान नहीं देना चाहिए जिससे वरुण गांधी और राहुल गांधी में कोई फर्क न रह जाए। वरुण गांधी को आज सभी जानते हैं लेकिन उनकी छवि सकारात्मक कम नकारात्मक ज्यादा है। लेकिन राहुल गांधी की छवि नकारात्मक तो नहीं ही हैं। इधर केंद्र से यह ज्वर निकलकर अब राज्यों तक भी पहुंच रहा है। दिग्विजय सिंह ने भी लगे हाथ तुलना कर डाली।
जिस प्रकार से घटना क्रम परिवर्तित हो रहा है उससे यही लगता है कि इस बार किसी भी दल को अयोध्या-बाबरी विवाद ने कुछ नहीं दिया तो सभी दल अपने अपने अनुसार बयानबाजी कर के ही कुछ प्राप्त करना चाहते हैं। लेकिन अब देष की जनता इतनी बुद्धु नहीं है।


शुक्रवार, 4 जून 2010

पर्दा, रोजगार और मुस्लिम महिलाएं

दारुल उलूम समय-समय पर अपने अनुसार फतवे जारी करता रहता है. देखा जाये तो पूरी दुनिया में इस्लाम के इस केंद्र की पहचान उसके फतवे को लेकर ही ज्यादा बनी है. जिसका वर्त्तमान परिपेक्ष से कोई लेना-देना नहीं है. दारुल उलूम कभी पर्दा पर, कभी शिक्षा पर तो कभी काम न करने पर फ़तवा जारी करता रहा है. महिलाओं को राजनीति में ३३ प्रतिशत आरछन देने की बात बहुत समय से चल रही है. लेकिन वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की ४०३ सीटों वाली विधानसभा में केवल २ मुस्लिम महिलाएं विधायक हैं. जम्मू कश्मीर जैसे मुस्लिम बहुल राज्य की ८७ सदस्यीय विधानसभा में भी महज दो ही मुस्लिम महिलाएं हैं.

मुस्लिम महिलायों को परदे के लिए न केवल भारत में बल्कि विश्व के कई हिस्सों में आवाज उठती रही है. क्या इज्जत के लिए पर्दा ही सबसे जरुरी है. परदे के द्वारा मुस्लिम समाज क्या छुपाना चाहता है? आज तक तो लोग अपनी गलतियों पर पर्दा डालते रहे है, अच्छाइयों को तो सब के सामने पेश किया जाता है. तो क्या इस आधार पर यह कहा जाय की मुस्लिम महिलाएं अच्छाई की नहीं बुराई का प्रतिक है. सुर-ए-नुरमा में मुस्लिम महिलाओं के लिए परदे की बात कही गयी है. लेकिन यह पर्दा केवल शरीर को ढकने के लिए नहीं है.

वास्तविक पर्दा तो कपड़ों में नहीं, नजरों में होता है. कपड़ों के पर्दों को तो कभी भी हटाया जा सकता है लेकिन नजरों के परदे को हटा पाना संभव नहीं लगता है. इस्लाम में केवल बेपर्दा होने की मनाही की गई है, लेकिन अपना पेट भरने के लिया मेहनत-मजदूरी करने की मनाही नहीं की गई है. जोधपुर शहर कांग्रेस अध्यक्ष सईद अंसारी का मानना है की फतवेबाजी से कौम का भला नहीं हो सकता है. यह गुजरे ज़माने की चीज है. इससे कौम नर्क के गर्त की ओर ही जायेगा. उन्होंने कहा कि यदि महिलाओं को यह फ़तवा है कि वे दूसरे मजहब के पुरुषों के साथ काम नहीं कर सकती हैं तो मुस्लिम पुरुषों के लिए भी फ़तवा जारी होना चाहिए कि वो भी अन्य मजहब की महिलाओं के साथ काम न करें. मुस्लिम समाज की पुरुष वादी मानसिकता ही है जो महिलाओं को तो अन्य मजहब वालों के साथ काम करने से रोक लगाती है जबकि पुरुषों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं करता है.

फतवे के रूप में पहचान बन चुकी दारुल उलूम इसलिए ज्यादा नाटक करती है कि मुस्लिम समाज आधुनिकता से दूर तथा शिक्षा के स्तर में बहुत नीचे है. मुस्लिमों में चार प्रतिशत लोगों ने भी स्नातक तक पढाई नहीं कि है. नेशनल सैम्पल सर्वे संगठन २००६ के अनुसार ३.६ प्रतिशत लोग ही मुस्लिम समुदाय के कुल कालेज ग्रेजुअट हैं. ३.१ प्रतिशत शहरों में तथा १.२ प्रतिशत गावों में ग्रेजुएट हैं. गांव कि जनसंख्या का ६०.०२ आज भी अशिक्षित हैं. शिक्षा का स्तर इतना कम होने के कारण धर्म के टेकेदार लोगों को आसानी से बरगलालेते हैं. अच्चा होता की

अन्धकार से क्यों घबराएं

अच्छा हो एक दीप जलाएं.

पहचान नहीं पाया

आवाज सुनी सुनाई लगती थी

दिल के करीब से आती थी

पर आज अपने यार की

आवाज को मै पहचान न पाया

भूल गया उसे या याद नहीं आया

आंसू बह के आज गालों पर सुख गए

उसकी आवाज में वही अपनापन था

पर आज उसकी आवाज को पहचान न पाया

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

केवल कागजों पर महिलाएं हुई ताकतवर

महिलाओं को सशक्त करने के लिए तथा उन्हें आरक्षण देने के लिए हमारी संसद कितनी तत्पर है इसका अंदाजा महज इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनसे जुडी कई परियोजनाएं वर्षों से केवल गठन प्रक्रिया से ही गुजर रही हैं। इस हकिकल का खुलासा तब हुआ जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुडी स्थायी संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वर्ष २००६-०७ में बलात्कार पीडिता के राहत एवं पुनर्वास के लिए महज एक करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई जो वर्ष २००८-०९ में बढकर ४० करोड़ हो गयी। इन मामलों से जुडी योजना कि प्रक्रिया बहुत लम्बी है और ऐसे मामलों से सम्बंधित स्वयं सिद्धा योजना का दूसरा चरण अभी तक शुरू नहीं क्या जा सका है। बलात्कार पीडिता के राहत एवं पुनर्वास के लिए २००८-०९ के बाद आवंटित राशि का उपयोग नहीं हुआ है क्योंकि परियोजनाओं को मंजूरी नहीं दी गयी है।

यह हाल केवल बलात्कार पीडिता राहत एवं पुनर्वास परियोजना का ही नहीं है। समिति ने कहा है कि महिलाओं से जुडी अन्य परियोजनों को भी नियमित रूप से धन आवंटित हो रहे है लेकिन उन्हें अभी तक मंजूरी नहीं मिली है। इनमें राजीव गाँधी किशोरवय बालिका सशक्तिकरण परियोजना, बलात्कार पीडिता राहत एवं पुनर्वास परियोजना, स्वयं सिद्धा परियोजना चरण-२, इंदिरा गाँधी मातृत्व सहयोग परियोजना और राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन प्रमुख रूप से शामिल हैं।

राजीव गाँधी किशोरवय बालिका सशक्तिकरण परियोजन का बजटीय अनुमान १११ करोड़ रुपये निर्धारित किया ग्यालेकिन अभी तक मंजूरी के इंतजार में मंत्रिमंडल कि अलमारी में पड़ी है। बलात्कार पीडिता राहत एवं पुनर्वास परियोजना के लिए ५९ करोड़ और स्वयं सिद्धा परियोजना चरण-२ के लिए २० करोड़ रुपये का बजटीय अनुमान है लेकिन दोनों परियोजनाएं अभी तक गठन कि प्रक्रिया से ही गुजर रही हैं।

ऊचें-ऊचें दावे करने वाली हमारी संसद कि पोल तभी खुलती है संसद में कोई रपट प्रस्तुत कि जाती है। महिला आरक्षण को लेकर या उनकी शक्ति में इजाफा करने के लिए सभी दलों के नेता एक साथ एक दुसरें का हाथ पकड़कर फोटो खिचवा लेते अहिं लेकिन लम्बे अरसे तक उन परियोजनाओं को अमली जामा नहीं पहनते हैं। मीडिया में बने रहने एवं वोट बैंक के लिए हर साल बहस होती अहि है सब हो जाते हैं लेकिन अंतिम मंजूरी नहीं-दी जाती है इनके कामों। लिए सरकारी टूर
मुद्दों पर har sal bahas hoti hai। sb सहमत भी हो जाते हैं। लेकिन अंतिम मंजूरी नहीं दी जाती है। इन कामों के लिए sarkari tour पर एक समिति का गठन क्र दिया जाता है। यह समिति समय-समय पर अपनी चिंता व्यक्त करती रहती है। चिंता व्यक्त करने के आलावा यह समिति और क्र ही क्या सकती है। महिलाओं कि स्थिति को लेकर गठित समिति ने पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए आवंटित धन का पूरी तरह उपयोग नहीं होने पर सख्त नाराजगी जताई है। समिति ने अपनी रपट में कहा है कि भौगोलिक और जलवायु सम्बंधित कठिनाइयों का सामना करने वाले इस क्षेत्र के लोगों की भलाई के लिए धन का उचित उपयोग किया जाना जरुरी है। सरकार लोगों को कब तक धोखा देती रहेगी और लोग कब तक धोखा खाते रहेंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लालफीताशाही के चंगुल में फंसी परियोजनेयं कब मंजूर होंगी और वास्तविक रूप से महिलाएं कब सशक्त होंगी ईसका अभी इंतजार करना होगा।

शनिवार, 19 सितंबर 2009

सवाल-जबाब

इकोनमी क्लास में कौन यात्रा करता है?
बकरियां।
भारतीय ट्रेन में यात्रा कौन करता है?
सूअरें।
तुम्हें संसद भवन कौन पहुंचाता है?
मतदाता।
मतदाता यात्रा किसमें करता है?
ट्रेनों मेंतो तुम्हारा मतदाता कौन है।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

विरासत पर सियासत

आजादी के लिए जान गवाने वाले अब रास नहीं आ रहे हैं। सरकार उनका वजूद मिटाने पर तुल गई है। सभी राज्यों के सरकारों के दिल में आजादी के दिवाने खटकने लगे हैं। उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने तो हद ही कर दी। राज्य सरकार ने सबसे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट के आजाद भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश कोठी तोड़ी और बाद में उस जेल को भी गिराने का प्रयास किया जिसमें बैठकर आजादी के परवानों ने ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ जैसी गीतों को लिखा था। यह सब महज इस लिए किया जा रहा है कि मायावती सरकार को बसपा विधायकों के लिए निवास स्थान बनाया जा सके। बसपा सरकार जब से सत्ता में आई वह पार्क, भवन आदि बनाने के लिए ऐतिहासिक इमारतों को गिराने का काम कर रही है। आधुनिक नेताओं के सामने आजादी दिवाने बौने पड़ गए हैं। ऐतिहासिक इमारतों का यह हाल केवल उत्तर-प्रदेश में ही नहीं है। मध्य-प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी चंद्रशेखर की प्रतिमा को हटाने का प्रयास किया जा रहा है। बलिदानी भी पार्टी के हो गए हैं। बसपा के लिए डाँ भीमराव अम्बेडकर स्वतंत्रता सेनानी हैं तो भाजपा के लिए सरदार पटेल। बसपा सरकार सोचती है कि आजादी की लड़ाई डाँ अम्बेडकर ने अकेली ही लड़ी थी। इसीलिए वह अम्बेडकर पार्क से लेकर अम्बेडकर ग्राम तक बना रही है। दूसरी तरफ आजादी की अन्य निसानियों को धूल चटा रही है।
सवाल यह उठता है कि इतिहास को इस प्रकार से मिटाया जाना कहां तक उचित है। इतिहास को मिटाना आसान है लेकिन बनाना ने केवल मुश्किल बल्कि असंभव है। अच्छा हो सरकार ऐतिहासिक इमारतों की रक्षा करे और उन्हें नया रुप और कलेवर दे।

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

रियालिटी शो का रियल

वर्तमान समय में इलेक्ट्रानिक मीडिया खासकर टेलीविजन पर रियालिटी शोज की भरमार है। लेकिन इसमें भाग लेने वाले उम्मीदवार अपने को एक सहज स्थिति में नहीं पाते हैं। ‘वार परिवार’ रियालिटी शो की एकता नाम की पार्टीसिपेंट ने कहा भी कि- अगर शो में टार्चर होके, डामिनेट होके करना है तो देयर इज नो प्वांइट आँफ डूइंग इट। रियालिटी शो में तो स्थिति यह आ गई है कि कहीं नस्लभेदी टिप्पणी की जाती है तो कहींपार्टिसिपेंट आपस में हाथापाई पर भी उतर आते हैं। 9एक्स पर एक रियालिटी शो शुरु हुआ- ‘वाॅलीबुड का टिकट’। इस रियालिटी शो के पार्टीसिपेंट में टेलीविजन कलाकार चेतन हंस राज जो कि बतौर पार्टीसिपंेट आए और एक नव आगन्तुक और पुनीत के बीच हाथापाई हो गई। रियालिटी शो में यह पहली घटना नहीं थी कि इस तरह की हाथापाई हुई। बाल अधिकारों को लेकर मीडिया में बहुत चर्चा हुई है। एक अनुमान के मुताबिक सबसे ज्यादा बाल अधिकारों का हनन रियालिटी शोज में होता है। जजों के द्वारा बच्चों को मानसिक रुप से इस कदर प्रताड़ित किया जाता है कि वे जीव भर के लिए विक्षिप्त हो जाते हैं। बांग्ला चैलन के एक रियालिटी शो में षिंजिनी से गुप्ता के साथ जजों ने इतने बुरे तरीके से बर्ताव किया कि वो लड़की दिमागी तौर पर बीमार पड़ गई। अब स्थित यह है कि वो लड़की न बोल सकती है न ही सोच सकती है। रियालिटी शोज में जज अब अति पर उतर आए हैं। बच्चों को लेकर तारीफ और बुराई का पुल बांधते हैं ये जज। अगर कोई अच्छा कर रहा है तो आसमान पर चढ़ देते हैं और उसी तरह जमीन पर भी गिरा देते हैं। सुधाीष पचैरी कहते हैं कि पुराने जमाने के बेरोजगार हो चले सितारे अब जज बनकर बैठ जाते हैं। रियालिटी शो में आने के लिए वे मानक निर्धारित करते हैं। ये जज उस मानक को अपने जमाने के अनुसार तय करते हैं। अतः इसमें स्वाभाविकता का होना संभव नहीं प्रतीत होता है।

रियालिटी शो किचड़ उछालने का शो बनता जा रहा है। एक प्रतिभागी दूसरे पर जितना किचड़ उछाले वह उतना ही रियल है। रियालिटी शो प्रतिभा को आगे लाने का नहीं दुष्मनी बढ़ाने का शो बनते जा रहे हैं। हालात ये है कि चैनल एक पार्टीसिपेंट को दूसरे के खिलाफ, एक घराने को दूसरे घराने के खिलाफ, एक मेंटर को दूसरे मेंटर के खिलाफ, यहां तक की एक राज्य का दूसरे राज्य के खिलाफ इस कदर खड़ा करते हैं कि मानों वे दोनों आपस में म्यूजिकल प्रोग्राम को टक्कर नहीं दे रहे हैं, वर्षों पुरानी दुष्मनी निकाल रहे हैं।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

सच तू बहुत ही कडुवा है।
तू घरों को जोड़ने का नहीतोड़ने का काम करता है।
सच जिस दिन तू सच का सामना
करेगासच कहता हूंतेरा
भी घर टूट जाएगा
सच तू खुद आज झूठ हो गया है।

मंगलवार, 2 जून 2009

modern family

NO Parents, No children
Double Income, One pet
Live alone
Although Unhappy.

शनिवार, 23 मई 2009

तेरा दिन मेरी रात


जब तुम नींद की आगोश में चली जाती हो

तुम्हें मीठे सपने आते होंगे।

तब मेरे दिन की शुरुआत होती है

जिसे तुम नास्ता कहती हो

वह मेरे लिए डिनर है

कितना बदल गया है सब कुछ

शायद में रात्रिचर हो गया हूँ।

सूरज का उगाना या अस्त होना

मैंने महीनों से नही देखा है।

सोचता हूँ कभी देखूं कि अब सूरज का रंग क्या हो गया है

मेरे जैसे है या मेरा साथ छोड़ दिया है।

काश कभी समय मिले.

बुधवार, 6 मई 2009

Development and we

Development is a very debatable matter in our society. In India there are too many NGOs and GOs for development. But what is development and what kind of prosperity India wants. It is a matter which should be solved immidatly. Development means not to develop only Economy and Technology. It means to develop more human dignity, safty, justice and equality.
On the first Independance Day Jawahar Lal Nehru has laid down broadly the parameters within which development had to be persued- The ending of poverty and ignorance and and disease and inequality of opportunity. In this context, Sen say- Economic growth is important but it is valuable precisely because it helps to eradicate deprivation and to improve capabilities and quality of life of ordinary people.
For national developmet India adopted five year plan. If we pay a sharp eyes on these plans we find that these does not create a sustainable development. Our Natural resources are near to disappear form the world. Since Independance, India has made significant progress in several area of Economy and Human development. Food production has gone up to provide adequate lavel of food securit, Infrastructre development has been satisfactory, a vast pool of traind Human resources has been developed. But on the other hand, there are about 260 million persons or about 26 per cent of population still continue to be below the normative poverty live. poverty is viewed not only in term of lack of adequate income but as a state of deprivation spanning the economic and social context of the people. they do not earn one dollor in a day. Near about 40 per cent childs are unable to celebrate their fifth birthday.
Education rate is still 56 per cent in India. National Human Development Report 2001 says; Some of the challenges and concerns in the area of political governance are criminalisation of public life, politics of vote bank, communal violence and corruption increasing very fastly.
Now we come back on Human development. what is Human development. Its says that HUMAN DEVELOPMENT IS THE END. ECONOMIC AND SOCIAL SECTOR DEVELOPMET ARE THE MEANS. We can identifies the human development by three dimension of well-beings
1) Longevity 2) Education 3) Command over resources
Human development is the development of the people, for the people and by the people. The 1990 seen the seting up of quite a few progressive institutions, formulation of several useful social policies and passing of a few progressive bills. there are some of them;
Institutions-
1) National Commission on Women in 1992 under the NCW Act, 1990.
2) National Human Right Commission set up in 1994, under the protection of Human Right Act 1993.
3) Consumer Protection Courts.
Policies-
1) Draft national policy on Women formulated in 1996.
2) National plan of action for children in 1992.
3) National plan of action for the girl child in 1991-2000.
Programmes
1) Mahila samridhi yojana.(MSY) lanched in 1993.
2) Joint Forest Managment (JFM).
People are the most valuable resources and the real wealth of Nation. So the development of the people is the development of the Nation. thus the first duty of the Government is to develop the quality of his people.

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

भावी प्रिये के नाम

मेरी भावी प्रिये,
बसंत का मौसम चल रहा है। आज ११ फ़रवरी है। वेलेनटइन डे अब बहुत दूर नही है। मै गुलाब का फूल कितने सालों से तुम्हारे लिए खरीदता हूँ और अंत में उदास होकर उसे किसी कूड़ेदान में डाल देता हूँ। इस प्रकार कब तब तुम आँख मिचौली खेलती रहोगी। आख़िर अब तो तूम्हारे बचपन के दिन नही है। अब यह बंद करो और आकर मुझे अपने बाँहों में भर लो।
प्रिये मै तुम्हारे साथ अपना सारा जीवन बिताना चाहता हूँ। मै चाहता हूँ कि तुम्हारे साथ किसी निर्जन स्थान पर बैठ कर बहुत सी प्यार भरी बातें करू। उस स्थान पर केवल पानी के बहने की आवाज आए और कुछ भी सुनाई न दे। वह पानी तुम्हारे पैरों को छूकर तुम्हारे चरणों के कमल को लेकर दूर तक जाए। साथ में मेरी आरजू भी रहे। जिससे सभी को यह पता चले कि कोई तुम्हारे कमल की खुशबु को बहुत चाहता
प्रिये
मै बहुत दिनों से सोच रहा हूँ कि मै तुम्हारे साथ किसी होटल में एक कप कॉफी पिता। कॉफी की महक के साथ मै तुम्हारे सांसों की खुशबु को अपने अन्दर ले लेता। मुझे इस बात की चाहत नही है कि मै वहां पर रात बिताऊ। मै उसके बाद सीधे घर वापस लौट आना चाहुगा।
किसी पार्क में बैठ कर मै तुमसे देश दुनीya के परे कि बात करना चाहता हूँ।
अच्छा चलो बहुत हो गया। कम से कम अब तो मेरे उपर अपने प्यार के बादलों की बारिस कर दो। जल्दी ही तुम्हें मैं दूसरा पत्र लिखूंगा। हो सके तो इसका जबाब देना।
तुम्हारा
उमेश कुमार

लोकतंत्र या गुंडा तंत्र

लोकतंत्र यानि गुंडा तंत्र
गुंडों का राज्य
मूर्खों का बहुमत
धूर्तों के साथ
मुर्ख राज्य की स्थापना
सुख स्वप्न के साथ
नीति की हत्या
अनीति का बोलबाला
वेश्या की अर्चना
सती का मुह काला
पर स्त्री गमन को आदर्श
चरित्र हीनता को शाबाशी
समझदार को नमस्कार
न समझ की जयकार
क्या
यही है हमारा लोकतन्त्र
मेरे यार